वाचस्पती

राग वाचस्पती कर्नाटक संगीत से लिया गया राग है। राग मारू बिहाग में निषाद कोमल करने से राग वाचस्पती बनता है। यह एक बहुत ही मधुर लेकिन अप्रचलित राग है।

बिहागड़ा

वादी: ग
संवादी: नि
थाट: BILAWAL
आरोह: सागमपनिसां
अवरोह: सांनि॒प नि॒ध॒प गमगपमग रेसा
पकड़: ऩि॒ध़॒प़ गमग पमग-सा
रागांग: उत्तरांग
जाति: SHADAV-SAMPURN
समय: रात्रि का द्वितीय प्रहर
विशेष: उभय निषाद।यह राग खमाज एवं बिहाग रागों का मिश्रण है। खमाज से बचाव - प नि सां, सां नि प का प्रयोग बिहाग से बचाव - नि॒ ध प, ग म ग का प्रयोग
 

चेरा नृत्य

लोक नृत्यों में चेरा मिज़ो जनों का बहुत पुराना पारम्‍परिक नृत्‍य है। भूमि पर आमने-सामने पुरुष बैठे होते हैं और बांसों की आड़ी और खड़ी कतारों में इन जोड़ों को लय पर खोलते और बंद करते हैं। लड़कियाँ पारम्‍परिक मिज़ो परिधान 'पुआनछेई', 'कवरछेई', 'वकीरिया' और 'थिहना' पहन कर नृत्‍य करती है तथा वे बाँस के बीच क़दम बाहर और अंदर रखती हैं। यह नृत्‍य लगभग सभी त्योहार के अवसरों पर किया जाता है। चेरा की यह अनोखी शैली उन सभी स्‍थानों पर अत्‍यंत मनमोहक प्रतीत होता है, जहाँ इसे किया जाता है। नृत्‍य के साथ गोंग और नाद-वाद्य बजाए जाते हैं। वर्तमान समय में आधुनिक संगीत भी इस नृत्‍य में उपयोग किया जाता है।

जोगिया

इस राग को जोगी नाम से भी जाना जाता है। राग भैरव के सामन ही इसमें रिषभ और धैवत कोमल लगते हैं, पर उन्हे लगाने का ढंग अलग होता है। राग भैरव में रिषभ और धैवत को आंदोलित किया जाता है वैसा आंदोलन जोगिया में कदापि नहीं किया जाता। अवरोह में निषाद का प्रयोग अल्प होता है और उसे सा से  पर जाते हुए कण के साथ में प्रयोग करते हैं। कभी कभी अवरोह में कोमल निषाद को भी कोमल धैवत के साथ कण के रूप में लगाते हैं जिससे राग और भी सुहवना लगता है। इस राग में रे१-म और ध१-म का प्रयोग मींड के साथ अधिक किया जाता है।

भिंडी बाज़ार घराना

भिंडी बाज़ार घराना हिंदुस्तानी संगीत के प्रसिद्ध

घरानों में से एक है। भिंडी बाज़ार घराने की सबसे विशिष्ट विशेषता खयाल है, जो खुले आवाज़ की प्रस्तुति है। आवाज़ का उपयोग कर, सांस नियंत्रण और लंबे मार्ग की एक सांस में गायन पर एक तनाव है।

संस्थापक

उस्ताद छज्जू खान

प्रतिपादक

उस्ताद अमन अली खान

शशिकला कोरटकर

अंजनीबाई माल्पेकर

राग परिचय

हिंदुस्तानी एवं कर्नाटक संगीत

हिन्दुस्तानी संगीत में इस्तेमाल किए गए उपकरणों में सितार, सरोद, सुरबहार, ईसराज, वीणा, तनपुरा, बन्सुरी, शहनाई, सारंगी, वायलिन, संतूर, पखवज और तबला शामिल हैं। आमतौर पर कर्नाटिक संगीत में इस्तेमाल किए जाने वाले उपकरणों में वीना, वीनू, गोत्वादम, हार्मोनियम, मृदंगम, कंजिर, घमत, नादाश्वरम और वायलिन शामिल हैं।

राग परिचय