दुर्गा

रात्रि के रागों में राग दुर्गा बहुत मधुर और सब लोगों का प्रिय राग है। रे रे म रे; ,ध ,ध सा - यह स्वर संगती राग को स्पष्ट बनाती है। सभी शुद्ध स्वर लगने के बावजूद इस राग का एक विशिष्ट वातावरण पैदा होता है जो की स्थाई प्रभाव डालने में समर्थ है। यह मूलतः दक्षिण भारतीय संगीत का राग है जो उत्तर भारतीय संगीत में भी लोकप्रिय हुआ है। मध्यम स्पष्ट लगने से यह राग खिलता है। इस राग में अवरोह में पंचम पर विश्रांति नही देनी चाहिये।

इस राग की प्रकृति न तो अधिक गंभीर है और न ही अधिक चंचल। इसमें ख्याल, तराने आदि गाये जाते हैं। यह स्वर संगतियाँ राग दुर्गा का रूप दर्शाती हैं -

राग के अन्य नाम

ढोल नृत्य

विवाह आदि मांगलिक अवसरों पर किया जाने वाला जालोर का ढोल नृत्य राजस्थान का एक प्रमुख लोकनृत्य है । प्रायः सरगरा, ढोली और भील जातियों द्वारा किया जाने वाला यह नृत्य प्ररूष प्रधान नृत्य है । इस नृत्य में एक कलाकार दो-तीन ढोल अपने शरीर पर रखकर उन्हें बजाता है और कई कलाकार एक साथ मिलकर कई ढोल बजाते हैं । किवदंती है कि जब जालोर बसा था उन्हीं दिनों सिवाणा गांव के खींवसिंह राठौड़ का सरगरा जाति की युवती से प्रेम हो गया और वह सिवाणा छोड़कर जालोर आ गया । यहां आकर खींवसिंह ढोल बजाने लग गया और जालोर का ढोल नृत्य प्रसिद्ध हो गया । जब एक वादक तीन ढोल एक साथ रखता है, तब वह एक अपने सिर पर रखता है, एक सामने की

राग परिचय

हिंदुस्तानी एवं कर्नाटक संगीत

हिन्दुस्तानी संगीत में इस्तेमाल किए गए उपकरणों में सितार, सरोद, सुरबहार, ईसराज, वीणा, तनपुरा, बन्सुरी, शहनाई, सारंगी, वायलिन, संतूर, पखवज और तबला शामिल हैं। आमतौर पर कर्नाटिक संगीत में इस्तेमाल किए जाने वाले उपकरणों में वीना, वीनू, गोत्वादम, हार्मोनियम, मृदंगम, कंजिर, घमत, नादाश्वरम और वायलिन शामिल हैं।

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