साम से उपजा संगीत
संसार में ऐसा कोई प्राणी नही हैं जिसे संगीत से प्रेम न हो,जिसे सुरीले गीतों को सुनना पसंद न हो,सात स्वर, जिसे स्वर्गीय आनंद में न डुबो देते हो ,कह्ते हैं मुग़ल शासक औरंगजेब संगीत से घृणा करता था,संगीतकारों को दंड देता था,कहानी यहाँ तक हैं कि, उस समय के संगीतकारों ने एक बार एक अर्थी लेकर जुलुस निकाला,जब राजअधिकारियो ने उनसे पूछा कि यह अर्थी किसकी हैं और इसे लेकर पुरे शहर में जुलुस निकलने से क्या अभिप्राय हैं?तो उन संगीतकारों ने जवाब दिया,"यह अर्थी संगीत की हैं,और हम इसलिए जुलुस निकाल रहे हैं ताकि औरंगजेब को यह पता चल सके कि उसके राज्य में संगीत कि क्या दशा हुई हैं। पर सच यह हैं कि औरंगजेब को
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ऑर्केस्ट्रा यानि...कुछ एक्स्ट्रा
आप सभी ऑर्केस्ट्रा के नाम से तो परिचित होंगे ही,आप में से बहुतो ने कोई न कोई ऑर्केस्ट्रा सुना ही होगा,वैसे तो आजकल हर छोटे- बड़े फंक्शन में ऑर्केस्ट्रा दिखाई सुने देता हैं,बेटी की शादी हो या,स्कूल में पेरेंट्स डे की मीट,ऑर्केस्ट्रा होना आम बात हैं,कभी स्कूल के वार्षिक उत्सव में ,कभी किसी होटल में आप आसानी से ऑर्केस्ट्रा सुन सकते हैं ,पिछले कुछ समय से लोगो का ऑर्केस्ट्रा की और रुझान बड़ा हैं,इस कारण बड़ी संख्या में अलग अलग नामो से,बड़े बड़े संगीतकारों द्वारा निर्देशित,ऑर्केस्ट्रा के ध्वनी मुद्रण बाज़ार में बिकने लगे हैं। जिसमे से कई बहुत लोकप्रिय हुए हैं,रिलेक्सेशन नाम का आदरणीय पंडित विश्वमोह
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फ्यूजन का कन्फ्यूजन
लीजिये जनाब,अब जमाना आ गया हैं फ्यूजन म्यूजिक का,जिसे देखो फ्यूजन कर रहा हैं,फ्यूजन सुन रहा हैं,बडे पिता की संतान हो,या नामचीन कलाकार,संघर्षरत कलाकार हो या ,नौसिखा गायक वादक,सब फ्यूजन की धुन में लगे हैं,आलम यह हैं की चारो दिशाओ में फ्यूजन हो रहा हैं और हम कन्फ्यूज़ हो रहे हैं.
आख़िर हैं क्या बला यह फ्यूजन ???आईये आज जानते हैं फ्यूजन के बारे में ।
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सुर न सधे क्या गाऊ मैं ?
सुर ना सधे क्या गाऊ मैं?सुर के बिना जीवन सुना ............सुर ना सधे ?
कितना सुंदर गीत हैं न!और कितनी सुन्दरता से एक गायक की मनोवय्था का वर्णन हैं ।
सुर की महिमा अपार हैं ,सम्पूर्ण जीव सृष्टि मैं सुर विद्यमान हैं ,उसी एक सुर को साधने में संगीत्घ्यो की सारी आयु निकल जाती हैं ,पर सुर हैं की सधता ही नही हैं । कहते हैं ........
" तंत्री नाद कवित्त रस सरस नाद रति रंग ।
अनबुढे बूढे,तीरे जो बूढे सब अंग । "
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सुरों को मैं माँ को अर्पित
जिस प्रकार सा जनक हैं सारे सुरों का ,साम गान जनक हैं शास्त्रीय संगीत का जिसके जैसा संगीत सारे संसार में कही नही हैं .साम वेद और चारो वेद अलौकिक और दुर्लभ हैं.
संस्कृत भी वह भाषा हैं जो सारी भाषाओ की जननी हैं .
दूसरा स्वर हैं ऋषभ,अर्थात रे,राग व् रस से परिपूर्ण कलाओ से समृध्ध हैं माँ तेरा आँचल,कही नही वह ६४ कलाए माँ तेरे आँगन में सुंदर बालको सी रात - दिवस खेल रही हैं ,अपनी सुंदर उपस्तिथि से तेरे रूप वैभव को द्विगुणित कर रही हैं.
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राग परिचय
हिंदुस्तानी एवं कर्नाटक संगीत
हिन्दुस्तानी संगीत में इस्तेमाल किए गए उपकरणों में सितार, सरोद, सुरबहार, ईसराज, वीणा, तनपुरा, बन्सुरी, शहनाई, सारंगी, वायलिन, संतूर, पखवज और तबला शामिल हैं। आमतौर पर कर्नाटिक संगीत में इस्तेमाल किए जाने वाले उपकरणों में वीना, वीनू, गोत्वादम, हार्मोनियम, मृदंगम, कंजिर, घमत, नादाश्वरम और वायलिन शामिल हैं।